क्या तरावीह की जगह क़ज़ा नमाज़ पढ़ सकते हैं? फतावा,فتاویٰ،دار الافتاء اہلسنت،,
Kya tarawih ki jagah qaza namaz padh sakte hen सवाल क्या फरमाते हैं उलेमा-ए-किराम इस मसले के बारे में कि अगर हिंदा अपनी क़ज़ा नमाज़ें पढ़ना चाहती हो, तो क्या रमज़ान में तरावीह की जगह वह क़ज़ा नमाज़ें पढ़ सकती है? रहनुमाई फरमाएँ। بِسْمِ اللہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِکِ الْوَھَّابِ اَللّٰھُمَّ ھِدَایَۃَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ तरावीह की नमाज़ हर अक़्लमंद और बालिग़ मुसलमान मर्द और औरत पर सुन्नते मुअक्कदा है, जिसका बिला वजह शरई छोड़ना जायज़ नहीं । और फुक़हा-ए-किराम की तसरीहात के मुताबिक़ क़ज़ा-ए-उमरी की अदायगी के लिए तरावीह और पांच वक्त की नमाज़ की सुन्नते मुअक्कदा को नहीं छोड़ा जा सकता । तरावीह की नमाज़ हर मुसलमान मर्द और औरत पर सुन्नते मुअक्कदा है। जैसा कि दुर्रे मुख़्तार में है: "(التراویح سنۃ) مؤکدۃ لمواظبۃ الخلفاء الراشدین (للرجال و النساء) اجماعاً" यानी तरावीह की नमाज़ मर्द और औरत पर बिल-इज्मा सुन्नते मुअक्कदा है कि खुलफा-ए-राशिदीन ने इस पर मोवाजबत फ़रमाई है।
( तनवीरुल अबसार म'अ दुर्रे मुख़्तार, किताबुस सलात, जिल्द 02, सफह 597-596, मतबूआ कोइटा ) सद्रुश्शरीअह मुफ़्ती अमजद अली आज़मी علیہ الرحمۃ फ़रमाते …