Imam ruku me ho to aane wala shakhsh hath bandhega ya nahi

इमाम रुकू में हो, तो आने वाला शख्स तकबीर तहरीमा कहकर पहले हाथ बाँधे और फिर इमाम के साथ रुकू में मिले, या हाथ बाँधे बिना रुकू में चला जाए?Imam ruku me

इमाम रुकू में हो, तो आने वाला शख्स तकबीर तहरीमा कहकर पहले हाथ बाँधे और फिर इमाम के साथ रुकू में मिले, या हाथ बाँधे बिना रुकू में चला जाए?Imam ruku me ho to aane wala shakhsh hath bandhega ya nahi फतावा,فتاویٰ،دار الافتاء اہلسنت،,

सवाल:
इमाम रुकू में हो, तो आने वाला शख्स तकबीर तहरीमा कहकर पहले हाथ बाँधे और फिर इमाम के साथ रुकू में मिले, या हाथ बाँधे बिना रुकू में चला जाए?

بِسْمِ اللہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ

اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِکِ الْوَھَّابِ اَللّٰھُمَّ ھِدَایَۃَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ

इमाम रुकू में हो, तो आने वाला शख्स इस तरह खड़े-खड़े तकबीर तहरीमा कहे कि तकबीर खत्म होने तक हाथ घुटनों तक न पहुँचें, फिर अगर वह जानता हो कि इमाम साहब रुकू में इतना वक़्त लगाते हैं कि वह सना पढ़कर इमाम के साथ रुकू में शामिल हो सकता है, तो तकबीर तहरीमा के बाद हाथ बाँधकर सना पढ़े, क्योंकि सना पढ़ना सुन्नत है। इसके बाद दूसरी तकबीर कहता हुआ रुकू में जाए।

और अगर यह गुमान हो कि सना पढ़ने की सूरत में इमाम साहब रुकू से उठ जाएंगे, तो तकबीर तहरीमा के बाद हाथ न बाँधे, बल्कि फौरन दूसरी तकबीर कहता हुआ रुकू में चला जाए, क्योंकि हाथ बाँधना उस क़याम की सुन्नत है, जिसमें ठहरकर कुछ पढ़ना मंशूर (प्रोजेक्टेड) हो और जिस क़याम में ठहरना और पढ़ना नहीं होता, उसमें सुन्नत हाथ छोड़ना है।

फतावा रज़विया में है:
"ज़ाहिर यह है कि मिस्ल क़याम हाथ बाँधेगा कि जब उसे क़ुनूत पढ़ने का हुक्म है, तो यह क़याम ज़ी क़रार व साहिबे ज़िक्र, मंशूर हुआ और हर ऐसे क़याम में हाथ बाँधना नकलन व शरअन सुन्नत और अक़लन व उर्फन अदब हज़रत।"

(फतावा रज़विया, जि 08, स 411, रज़ा फाउंडेशन, लाहौर)

وَاللَّهُ أَعْلَمُ عَزَّ وَجَلَّ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ صَلَّى اللَّهُ تَعَالَى عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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